सरसों के इतिहास फायदे उपयोग। सरसों के गुण।

सरसों की उत्पत्ति कब हुई ? सरसों (राई) के फायदे औरउपयोग

नमस्कार आप सभी का स्वागत है । मैं हूं आपके साथ । आज हम सरसों के इतिहास के बारे में तथा उनके गुणों के बारे में जानेंगे ।

बेशक पीले रंग के फूलों को देखना है हर किसी का मन होता है । छोटे छोटे गोल मटोल सरसों के बड़े-बड़े लहराते पौधों को देख कर जिंदगी में तब्दील हो जाती है । ऐसा लगता है जीवन की बंजर होती धरती में भी फूल खिले रहते हैं ।

हरियाली में सरसों की पीलीमां का आकर्षक फूलों जैसा ही है तो चलिए सरसों के गुणों को और बारीकी से जानते और समझते हैं ।

बिज बोल सकते तो सुनाते कहानियां । यह वह बीज है जो इंसान की चाहत बन गए थे । यह एक ऐसा मसाला है जिसका मानव सदियों से दीवाना रहा है । यह है सरसों की अजब कहानी ।

सरसों या राई हमारी मसाला दानी का अनोखा मसाला है । राई का प्रयोग ढोकला बनाते समय भी करते हैं । इसके अलावा तड़का लगाने के लिए भी राई का प्रयोग करते हैं ।

जब भी हम कड़ी बनाते हैं , तब भी कड़ी में राई का छोंक जरूर लगाते हैं । उसके बिना तो कड़ी का स्वाद ही नहीं बनता है ।

रसोई का एक अभिन्न अंग होता है राई । इसका इतिहास बहुत पुराना है तथा बहुत गहरा है । बहुत समय पहले धरती पर एक पौधा उगा था । आकर्षक तथा जंगली पौधा था ।

इंसान ने उस पौधे को चखा। किसी को पत्तियां अच्छी लगी तो किसी को फूल अच्छे लगे तो किसी को उस पौधे की जड़ तथा अन्य भाग अच्छे लगे । जिसके कारण वह कुछ तो खा लेते तो कुछ उगा लेते थे ।

इस प्रकार मानव पौधे को चुनता तथा उसे उगाता था । इस प्रकार लगातार कई वर्षों तक चलने के बाद जंगली पौधे से उत्पन्न हुआ सब्जी का एक पौधा सरसों का पौधा । जिसे हम सब परिचित हैं ।

सरसों किस परिवार का सदस्य है । सरसों का वैज्ञानिक नाम क्या है ?

यह पौधा Brassicaceae परिवार का सदस्य है । जिसकी उत्पत्ति में मानव की बहुत बड़ी भूमिका है ।इस पौधे को दिशा मिली बीज के चयन के कारण । बहुत सारी साग सब्जियां तथा सरसों भी इसी में आता है ।

इस परिवार के पौधे देखने में अलग-अलग होते हैं । यह कभी एक जैसे तथा समान नहीं होते हैं । इनके परिवार के पौधों में काफी विभिनता पाई जाती है ।

सरसों भी इसी परिवार का ही सदस्य है । यह तीखा मसाला है । इसको Cruciferae कहते हैं । यह नाम उसके चार पंखुड़ी वाले फूल के कारण इसे मिला है ।

कोई भी नहीं जानता है कि सरसों की उत्पत्ति कब हुई यह बहुत ही पुरानी फसल है । माना जाता है कि रोम वासियों ने सबसे पहले इसे चखा था ।

सरसों की उत्पत्ति कब हुई ? सरसों की उत्पत्ति कैसे हुई ?

सोमवार से अंगूर के रस को अपनी भाषा में must (grape juice ) बोलते थे उसमें वह सरसों के बीजों को मिला थे । इससे बनता Mustum ardens . इस नाम का अर्थ ही जलन ( Burning Must )होनी चाहिए ।

सरसों को अंग्रेजी में क्या कहते हैं ?

इसी प्रकार सरसो को उसका अंग्रेजी नाम musterd मिला । यह कहानी तो थी सरसों का नाम कैसे पड़ा आइए अब आगे जानते हैं ।

सरसों एक है सा मसाला है । जिससे की आंखों में आंसू आते हैं तथा जीभ पर जलन होती है ।‌

सरसों की उत्पत्ति कहां हुई ?

अभी तक किसी को भी यह ज्ञात नहीं है कि सरसों की उत्पत्ति कहां हुई । इसका अभी तक कोई भी ठिकाना नहीं है । लेकिन यह पौधा बहती हवाओं के साथ, कीट पतंगों के साथ तथा मनुष्य के साथ दुनिया भर में हर जगह फैल गया ।

स्पेन के पादरियों के साथ सरसों ने बड़ी-बड़ी यात्राएं की थी । स्पेन के पादरी जब भी धर्म प्रचार के लिए बड़ी-बड़ी यात्राओं पर जाते थे , तब वह रास्ते में सरसों के बीज छिड़कते जाते थे ।

यह सरसों जंगली झाड़ियों की तरह बेपरवाह होती जाती थी । सरसों जंगली झाड़ियों की तरह कहीं पर भी पैदा हो सकती थी ।

सरसों के पत्तों का उपयोग सब्जी के रूप में

अब तो सरसों ने मानव पर अपनी धाक जमा ली थी मानव इसकी खेती बड़े ही चाव से करता था । इसके पत्तों का उपयोग मानव साग सब्जी के रूप में प्रयोग करने लगा तथा इसका तेल का प्रयोग सब्जी में भी इस्तेमाल होने लगा ।

राजस्थान राजा महाराजाओं की धरती है । यहीं सरसों की सबसे अधिक पैदावार तथा सबसे अच्छी किसम का घर है ।

उदयपुर का एक गांव सरसों प्रधान गांव

उदयपुर के पास है Birothi । यह एक छोटा सा गांव है । यह गांव कृषि प्रधान गांव है । फरवरी का अंत है और सर्दी विदा लेने को तैयार है । यही समय है सरसों की कटाई का । सरसों किसानों को अपनी ओर बुला रही है ।

सरसों की फली को क्या कहते हैं ?

सरसों के फूल खिल कर के जड़ चुके हैं । सरसों के पौधे सूख गए हैं । सरसों की अगली पीढ़ी सूखी फलियों में कैद हो गई है । जिसे लेटिन भाषा में ऐसी फलियों को Siliqua ( seed Capsule ) भी कहते हैं ।

सरसों की फसल की कटाई कैसे की जाती है ?

सरसों को फलियों के साथ ही तोड़ा जाता है । पूरा सूखा पौधा ही काट लिया जाता है । देखने में तो यह काम बहुत ही आसान लगता है । लेकिन यह काम बहुत ही अलग है ।

सरसों को फलियों से कैसे निकाला जाता है ?

सरसो को फलियों से निकालने के लिए किसान बेल का प्रयोग करते हैं । वह सरसों की फसल को एक ढेर के रूप में इकट्ठा करके उसके ऊपर बैलों को चलाते हैं जिससे कि बेल के खुर से सरसों की फलियां फुटकर के सरसों के दाने बाहर निकल जाते हैं ।

छोटे किसान इसी पारंपरिक तरीके से सरसों के बीजों को सरसों की फलियों से बाहर निकालते हैं । जबकि बड़े किसान मशीनों की मदद लेते हैं ।

मानव तथा पशु एक दूसरे के सामंजस्य से यह काम करते हैं और यह फसल तैयार हो जाती है ।

बीजों को भूसे से अलग कैसे किया जाता है ?

सरसों के बीजों को भूसे से अलग करने के लिए छलनी या फिर हवा का सहारा लिया जाता है । इन दोनों की मदद से ही बीजों को भूसे से से अलग किया जाता है ।

सरसों बहुत बड़ी जल्दी ही होती है । यह 90 से 110 दिन में पक करके तैयार हो जाती है । यह एक ऐसी फसल है जिसकी मांग हमेशा बनी रहती है ।

प्राचीन काल में सरसो को स्वाद के लिए कम तथा औषधि के रूप में ज्यादा प्रयोग किया जाता था । यह इतनी बहुमूल्य थी कि यूनान में स्वास्थ्य के देवता Asclepius ( Demigod of Healing ) की तरफ से मानवता को भेंट समझा जाता था ।

सरसों के बारे में पाइथागोरस के विचार । हिपोक्रिटस सरसों के बारे में क्या कहते हैं ?

महान गणितज्ञ तथा विज्ञानिक पाइथागोरस के अनुसार बिच्छू के काटे जाने के स्थान पर सरसों लगाने से राहत मिलती है ।

इसके एक सौ साल बाद आधुनिक चिकित्सा के जनक हिपोक्रिटस (Hippocreates ) सरसों का प्रयोग अनेक रूपों में कर रहे थे ।

दांत दर्द में सरसों का प्रयोग

वह सरसों के लेप का प्रयोग दांत के दर्द को ठीक करने के लिए तथा मांसपेशियों को तनाव से राहत के लिए और अन्य कई रोगों के लिए भी सरसों का प्रयोग करते थे ।

ईसा मसीह से करीब 4 शताब्दी पहले आयुर्वेद के सुश्रुत थकान व उदासी को दूर करने के लिए बिस्तर में पीली सरसों का प्रयोग कर रहे थे ।

आचार्य चरक और सरसों का संबंध

आचार्य चरक को पीसी हुई सरसों में बहुत ज्यादा ही आस्था थी । सरसों में शरीर को गरमाने की ताकत समझी जा चुकी थी ।

संस्कृत में सरसों को क्या कहते हैं ? संस्कृत में सरसों का नाम ।

अनेक गुणों वाली सरसो को संस्कृत में कई नाम मिले । जिनमें से कुछ नाम sarsapa , siddharthaka , Rajika है ।

सरसों के बीजों का तथा तेल का प्रयोग बहुत सारे रोगों के निदान में भी किया जाता था । हृदय से लेकर हड्डियों तथा बुखार से लेकर मिर्गी तक सरसों का उपयोग किया जाता था ।

इंसान सदियों से सरसों का प्रयोग लेपन तथा खुराक दोनों के माध्यम से करता आया है ।

सरसों का स्वाद कब आता है ?

सरसों के दाने बिना मेहक वाले होते हैं । जब इन्हें ठंडे तेल में डाला जाता है तब इनका कोई स्वाद नहीं होता है । जब इन्हीं दानों को गर्म तेल में डाला जाता है तो इनका स्वाद ही बदल जाता है ।

सरसों के दाने में कौन सा रसायन होता है ?

सरसों के हर दाने में सिलीग्रीन ( Sinigrin ) पाया जाता है । सीनिग्रीन एक प्रकार का Glucosinolate है। सरसों के परिवार में यही तिखे अणु मिलते हैं ।

सरसों के बीजों में एक एंजॉय भी पाया जाता है । जिसका नाम Myrosinase Enzyme है । अंदर झांकने पर आप पाएंगे कि सीनिग्रीन और Myrosinase दोनों अलग-अलग थैलियों में बंद होते हैं ।

यह दोनों आपस में कभी मिल नहीं सकते हैं । सरसों की अलग-अलग फसल में अलग-अलग तरह के दाने मौजूद होते हैं । इनी एंजाइमों के कारण उनके तिखेपन में भी अलग-अलग स्वाद महसूस होता है ।

जब हम सरसों के दाने को गर्म तेल में डालते हैं तब यह दोनों रसायन आपस में मिल जाते हैं और यह दोनों रसायन आपस में सिर्फ नमी में ही मिल पाते हैं । यह दोनों रसायन पानी या फिर तेल में ही आपस में मिलते हैं ।

यह दोनों रसायन आपस में मिलकर के Allyl Isothiocyanate बनाते हैं । सरसों की उत्पत्ति मानव के लिए दवा या फिर मसाला बनने के लिए कभी भी नहीं हुई थी ।

सरसों की उत्पत्ति तो विकास तथा जिंदा रहने के लिए था । बीज के तिखेपन ने उसे खाने वाले जानवरों से बचाया । इसी खूबी का एक प्राकृतिक डिजाइन तैयार हुआ ।

पौधे कभी भी अपने आप को जेहर नहीं दे सकते हैं । इसलिए इसके जितने भी कंपाउंड या फिर रसायन होते हैं । वे अलग-अलग थैलियों में बंद हो जाते हैं ।

जानवर सरसों को क्यों नहीं खाते हैं ?

Allyl Isothiocyanate नाइट्रोजन , कार्बन सल्फर से मिलकर बना होता है । जिनका तिखापन जानवरों को दूर रखता है जो कि उसे खाते हैं ।

यदि कोई जानवर इस पौधे को खाता है तो उनके मुंह में जलन हो जाती है तथा उनके मुंह में छाले तक हो जाते हैं । इसीलिए इस पौधे को कोई भी जानवर नहीं खाता है ।

लेकिन इंसान तो उसे अपने स्वाद में ढालने की कला में माहिर था । दुनिया भर में सरसों इंसान की मनपसंद मसाला रही है ।

वास्कोडिगामा का सरसों से अटूट संबंध

यह इतनी मनपसंद रही है कि जब वास्को डी गामा जब पहली समुद्री यात्रा पर निकले तब वह अपने साथ में सरसों लेकर निकले थे ।

रविंद्र नाथ टैगोर ने अपनी कविता में भी सरसों के फूलों के खिलने के बारे में एक बड़ी सारी कविता लिखी है । रविंद्र नाथ टैगोर ने सरसों के फूलों का वर्णन खुशबूदार अग्नि के खिलने के सामान किया ।‌

बंगाल राज्य में तो सरसो को बहुत ज्यादा ही महत्व दिया जाता है । यहां पर सरसों को राजा के समान माना जाता है । खाने में सरसों का उपयोग तो बंगाली बड़े ही चाव से करते हैं । सरसों उसकी संस्कृति का एक हिस्सा बन गया है ।

भारत के किस राज्य में सरसों की सबसे अधिक पैदावार होती है ?

भारत के उत्तर प्रदेश में भी सरसों की को पैदावार होती है । यहां पर सरसों की खेती नहीं बल्कि यहां पर सरसों के तेल का ज्यादा उत्पादन होता है ।

सरसों का तेल तिखा तथा कड़वा होता है । उत्तर प्रदेश में यही नजारा आपको जगह जगह पर देखने को मिल जाता है । बीज पिसते जाते हैं और तेल टपकता रहता है । सरसों के बीजों से तैयार खली को पशुओं को खिला दिया जाता है ।

सरसों में जो तिखापन होता है । वह अब तेल में आ जाता है । जो कि सरसों के तेल को शुद्ध प्योर तथा ओरिजिनल होने का प्रमाण देता है ।

जब तक सरसों के तेल से आंख में जलन नहीं होगी । तब तक यह नहीं मान सकते कि सरसों का तेल ओरिजिनल है । ओरिजिनल तेल से ही जलन होती है ।

सरसों के तेल का प्रयोग खाना पकाने के रूप में सदियो से चला आया है । सीएफटीआरआई प्रयोगशाला में सरसों पर शोध चल रहा है ।

सरसों में गंधक वाले अमीनो एसिड प्रचुर मात्रा में पाया जाता है । तेल वाले ज्यादातर बीजों में यह एसिड नहीं पाया जाता है । सरसों में अमीनो एसिड का संतुलन बढ़िया मात्रा में होता है ।

सरसों के बीजों में पाया जाने वाला ग्लूकोसाइनोलेट मधुमेह तथा हृदय रोगों की नई दवाई बनाने में काम आ रहा है ।

जब सरसों के बीजों से तेल निकाला जाता है । तब सरसों के बीज का तीखापन खली में चला जाता है और तेल में स्वाद नहीं रहता है । इस समस्या का समाधान सीएफटीआरआई ने निकाल दिया है ।

सरसों के बीज में करीब 35% तेल पाया जाता है । यह तेल हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है । ह्रदय के रोगों से बचाने में भी यह काफी कारगर साबित होता है । सरसों के तेल की तुलना विश्व में मछली के तेल से की जाती है ।

सरसों (राई) के फायदे औरउपयोग

सरसों के बीजों का तथा तेल का प्रयोग मालिश के रूप में भी किया जाता है । सरसों के बीज को दरदरा पीस लिया जाता है और उसमें सरसों का तेल मिला दिया जाता है और फिर उसकी मालिश शरीर पर की जाती है ।

सरसों के तेल की मालिश करने से माना जाता है कि बच्चों की हड्डियां मजबूत होती है और उनके हाथ पैर सीधे होते हैं और शरीर पर छोटे-छोटे बाल भी ज्यादा नहीं आते हैं ।

क्योंकि सरसों के तेल तथा उसके दलीय में सल्फर मौजूद होता है । जो कि हमारी त्वचा के लिए अच्छा होता है । यह हमारे शरीर में गर्माहट पैदा करके रक्त संचार को बढ़ाती है । इससे हमारी त्वचा तथा हड्डी दोनों को ही लाभ होता है ।

प्राचीन समय में जर्मनी में पर्था थी की नई नवेली दुल्हन या फिर वधू अपने कपड़े की तुरपन में राई को बांधने थी मान्यता थी । उनका मानना था कि ऐसा करने से नए घर में उनकी धाक जम जाएगी ।

भारत में वर्षों को पूरी आत्मा भगाने का टोटका समझा जाता है । घर के चारों ओर राई के या फिर सरसों के बीज छिड़कने की प्रथा थी ।

सरसों के बीजों को बड़ा ही ताकतवर समझा जाता था । यह बीज थे आस्था के बीज । किसानों के लिए यह एक बुनियादी जरूरत है । यदि बीज अच्छे होते हैं तो फसल भी अच्छी होती है ।

बिरोठा गांव में है कम्युनिटी सोड बैंक । यह किसानों का सामूहिक बीज बैंक है । यह राष्ट्रीय पादप ब्यूरो अनुसंधान के निर्देशन में चलता है । इसका लक्ष्य बीजों का सरंक्षण है ।

विशेष रुप से देशी बीजों को बचाकर के रखना । क्योंकि यही बीज यहां की मिट्टी के अनुरूप ड
ढले हुए हैं ।

गौतम बुद्ध की सरसों से जुड़ी कहानी

एक बार एक बच्चे की अकारण ही मृत्यु हो गई । शोकाकुल बच्चे की मां रोती हुई गौतम बुध के चरणों में जा गिरी । उनसे बच्चे को जीवित करने की भीख मांगने लगी ।

गौतम बुद्ध ने उस महिला से कहा कि ऐसे किसी भी घर से मुठ्ठी भर सरसों के दाने ले आओ । जिसने कभी भी किसी की मृत्यु ना देखी हो ।

और गौतम बुद्ध ने वादा किया कि वह बच्चे को फिर से जिंदा कर देंगे । यदि वह सरसों के , बताए अनुसार दाने ले आती है तो यह बालक जिंदा हो जायेगा ।

वह महिला घर-घर प्रत्येक घर में गई । लेकिन उसे सरसों के दाने नहीं प्राप्त हुए और ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं मिला जो कि मृत्यु से अछूता हो ।

तब उस महिला को समझ में आ गया कि मृत्यु भी अटल सत्य है । जहां पर जीवन होता है । वहां पर मृत्यु निश्चित होती है ।

पवित्र बाइबल में भी सरसों और आस्था का आपस में गहरा संबंध है । उसमें लिखा है कि यदि सरसों के बीज मात्र जितनी भी आस्था हो तो आप इस पर्वत से कहो कि यहां से वहां जाओ तो वह चला जाएगा ।

सरसों में खानपान के साथ भाषा को भी एक अलग ही रंग दिया है । जैसे की हम बोलचाल की भाषा में भी बोलते हैं हथेली पर सरसों उगाना । ऐसे मुहावरों का प्रयोग हम सदियों से करते आ रहे हैं ।