लौंग का रोचक इतिहास। भारत में लौंग की खेती कहां होती है।

लौंग का रोचक इतिहास । लौंग का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य

आज हम लौंग के इतिहास के बारे में जानेंगे । लौंग मसालों की शोभा हि नहीं बढ़ाता बल्कि खाने में स्वाद भी बढ़ाता है । इसके साथ ही यह स्वास्थ्य के लिए बहुत ही लाभदायक है । भारत के अलावा कई अन्य देशों में में लौंग उगाए जाते हैं । आज से लगभग 3000 साल पहले लोग एशिया के कुछ द्विपों में ही पाया जाता था ।

लौंग का रोचक इतिहास । लौंग का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य

कील का मसाले से भला क्या रिश्ता । लेकिन अगर लौंग की बात है तो इससे करीबी रिश्ता है । लौंग को अपना नाम कील मिला है इसका अंग्रेजी नाम clove है । इसका यह नाम CLAVUS से आया है ।

आज हम आपको तिखे लौंग के बारे में बताएंगे जो वास्तव में पेड पर उगने वाली कलियां होती है ।

लेकिन वह कलियां खिल कर फूल नहीं बनती है । लौंग, लवंग , clove तिखा खुशबूदार मसाला है । इसका एक पहलू रक्त से सना हुआ है और हिंसा और लालच से रंगा हुआ है ।

दूसरी और बुद्धिमता , आस्था , संकल्प , सौंदर्यता और स्वास्थ्य । लौंग ने तो धरती पर नए रास्तों कि खोज को आयाम दिया । लौंग का खाने में बहुत अच्छा स्वाद आता है ।

अपनी मीठी महक के साथ हमारे जीवन में संस्कृति और मशालदानी का एक अनूठा हिस्सा बन गई है लौंग ।

लौंग को दो धारी तलवार कहते हैं ।

लौंग को दो धारी तलवार कहते हैं । अगर लौंग ने अपना गलत प्रभाव दिखाया तो हमारा नुकसान भी हो सकता है ।

बड़ी पुरानी मान्यता है कि लौंग का पेड़ तभी बड़ा होगा जब उसे पहाड़ दिखेंगे और समुंदर की खुशबू आएगी ।

पश्चिमी घाट में ही उगते हैं लौंग । अरब महासागर के साथ चलती पहाड़ियों के साथ ही लौंग होता है । पश्चिमी घाट अपनी अनोखी विविधता के लिए भी प्रसिद्ध है ।

पश्चिमी घाट 16 किलोमीटर की हरि घास है । जिसमें बहुत सारे विविध प्रकार के पेड़ पौधे पलते और बढ़ते हैं । पश्चिमी घाट को मसालों का पालना भी कहा जाता है। यहीं पर उगते हैं लौंग ।

सदाबहार पेड़ , पतले तने , चमकीले पत्ते और यह देखने में तेज पत्तों की तरह और गुछो में लटकती हुई गुलाबी कलियां । मानो छोटी-छोटी तीखी किले हो।

लौंग का वैज्ञानिक नाम क्या है ?

syzygium aromaticum ‌ यह लौंग का वैज्ञानिक नाम है । यह समझना मुश्किल नहीं है । syzgium मतलब जुड़ी हुई पंखुड़ियों से बना कील के सिर जैसा सिरा।

aromaticum का मतलब है खुशबूदार।
Myrtaceae परिवार का सदस्य है लौंग । लौंग अनखिली कलियां होती है ।

गुच्छे के रूप में कलियां होती है । यह वह मसाला है जो कि विश्व भर में इतिहास गढा है ।

हमारी पृथ्वी सदा गतिमान है ना सिर्फ सूर्य कि वह प्रदक्षिणा जो मौसम बदलती है । वह चक्कर जो दिन को रात में बदलता है ‌। बल्कि उसके गर्भ की गहराई की गति । वह बल जो धरती की गति को तरासते और बदलते है । उष्ण कटिबंध रेखा पर है मलूका द्विप ।

लौंग का जन्म कहाँ हुआ था ?

मलूका द्वीप ज्वालामुखी के फटने से तथा टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने से उत्पन्न हुआ था । यहीं पर जन्म हुआ था लौंग का । कई 100 साल पहले यहीं पर लौंग का जन्म हुआ था । और यहीं पर यहां के लोकल समुदाय के लोग रहते थे ।

यह लोग प्रकृति प्रेमी तथा शांतिप्रिय थे । इनका लगाव पौधों से जुड़ा हुआ था । जब भी किसी बच्चे का जन्म होता था तब लौंग का पेड़ लगाया जाता था ।

यहां के लोगों की मान्यता के अनुसार लौंग का पेड़ बच्चे के स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता था । खोज के युग में पूरा यूरोप मसाले को तलाश रहा था ।

वर्ष 1512 के आखिरकार में पुर्तगाली इन द्वीपों तक पहुंच गए । इन पर आधिपत्य जमाने में जरा भी देर नहीं की । लॉन्ग उस समय में बहुत ही कीमती तथा दुर्लभ था

लालच के मारे पुर्तगाली अपने दीपों से बाहर सभी दीपों पर लौंग के पेड़ को नष्ट करना शुरू कर दिया जो दीप उनके नियंत्रण में नहीं था । वहां पर उन्होंने लौंग के पेड़ों को नष्ट करना शुरू कर दिया ।

यहां पर जो भी लौंग को बाहर ले जाता था उनको तो मार दिया जाता था । इतना कठोर कानून था लौंग को लेकर के । लौंग के कुल 65000 पेड़ों को नष्ट कर दिया गया था । मसाला दीपों की शांति भंग हो गई थी ।

लौंग का इतिहास रक्त और हिंसा से सना हुआ।

लौंग का इतिहास रक्त और हिंसा से सना हुआ है लेकिन लौंग ने सीमाएं तोड़ दी । भारत में लौंग के बागान अंग्रेजों ने लगाए । 18 वीं शताब्दी में हमारे देश में लौंग खूब उग रही थी ।

पश्चिमी घाट वर्षा तथा आदर्श मिट्टी के कारण लौंग का घर बन गया । देश के तीनों दक्षिणी राज्यों में लौंग की पैदावार होती है ।

लौंग को तोड़ने का समय कब होता है ?

फरवरी के पहले सप्ताह में लोगों की फसल पक करके तैयार हो जाती है । अब लौंग को तोड़ने का समय आ गया है । इस समय कलियां ताजी तथा हरी भरी होती है लौंग कलियों के रूप में होती है । कुछ कलियां हरी होती है तथा कुछ कलियां गुलाबी होती है ।

जब कलियां थोड़ी सी खिल जाती है तब किसान समझ जाते हैं कि अब लौंग को तोड़ने का समय आ गया है । तब इस लौंग की कलियों को तोड़ देते हैं ।

लौंग की सारी कलियां एक साथ नहीं खिलती है । यह कलियां अलग-अलग समय में खिलती है । कुछ कलियां पहले खिल जाती है तथा कुछ कलियां बाद में खिलती है

लौंग का असल में पेड़ होता है । किसान पेड़ों के ऊपर चढ़कर के गुच्छों में से लौंग की कलियों को तोड़ते हैं । हल्की सी मरोड़ से लौंग के गुच्छे टूट जाते है । कलियां काफी सख्त तथा हरी भरी होती है ।

लौंग की कलियों कैसी होती है ?

लौंग की कलियों के सिर ऊपर से बंद तथा गोलाकार होते हैं । रंग में तो यह हरे तथा गुलाबी होते ही है । लौंग के अंदर तो तेल मौजूद होता है । वह कलियों के अंदर बंद होता है ।

लौंग का पूरा पेड़ ही खुशबूदार होता है लॉन्ग क्या प्राप्ति भी खुशबूदार होते हैं उनका तनाव भी खुशबूदार होता है कलियां भी खुशबूदार होती है । लेकिन हमारी पसंद तो लौंग की कलियां है ।

करीब 5 साल की उम्र होते ही लौंग के पेड़ पर फूल आना शुरू हो जाते हैं । बीज से उगने वाला यह पेड़ करीब 80 साल तक फल देता है । हर पेड़ हर साल 29 से 40 किलो लौंग देता है । किसी भी किसान के लिए कटाई तथा कड़ाई का दिन विशेष होता है ।

लौंग के संबंध में महत्व वजन का नहीं लौंग की तेजी का होता है । लोंग की ताजी कलियां खुशनुमा तथा महकदार होती है ।

लौंग ऐसे ही प्राप्त नहीं होता । लौंग को प्राप्त करने के लिए कली से या फिर गुच्छे से लौंग को तोड़कर के अलग किया जाता है । उसके बाद में लौंग तथा कली अलग अलग हो जाते हैं ।

लौंग को धूप में 1 दिन के लिए ही क्यों सुखाया जाता है ?

लौंग को कली से अलग करने के बाद में इसे सुखाना जरूरी होता है । ऊनी कंबल पर हरि कथा ताजी लॉन्ग को फैला दिया जाता है । लौंग को धूप में 1 दिन के लिए सुखाया जाता है ।

यदि लौंग को 1 दिन से ज्यादा धूप में सुखा दिया जाए तो लौंग की मेहक तथा तेल उड़ जाते हैं । इसीलिए लौंग को 1 दिन के लिए ही धूप में सुखाया जाता है ।

1 दिन धूप में तथा एक हफ्ता छाया में सुखाने से लौंग का रंग बदल जाता है । अब लौंग हरे से लाल तथा भूरे रंग का हो जाता है । लौंग का वजन भी पहले के वजन का अब एक तिहाई रह जाता है ।

लेकिन लौंग की महक अभी भी लौंग के अंदर कैद है । लौंग एक प्राचीन मसाला है । इससे पूर्व तीसरी शताब्दी चीन में Han Dynasty . ( 3rd Century BC )
दरबार में राजा के सामने बात करने वाले को लौंग चबानी होती थी । ताकि सांस महकती रहे । पुराने जमाने में लौंग राजसी शोख थी ।

उत्तर भारत की प्रसिद्ध खटास से भरी कड़ी लौंग के बिना अधूरी मानी जाती है । राजस्थान में दही की कड़ी बनाते समय कुछ लौंग को इसमें डाल दिया जाता है ।

बेसन को भारी माना जाता है । क्योंकि बेसन जल्दी से पचता नहीं है । लेकिन यदि कड़ी में लौंग को डाल दिया जाए तो बेसन पचने में आसानी होती है ।

लौंग को खाने की हर चीज में शामिल किया जाता है । क्योंकि लौंग की तासीर गर्म होती है । जिससे कि यह खाना पचाने में भी सहायता करता है और खाना आसानी से पच जाता है ।

लौंग की उत्पत्ति भारत में नहीं हुई है । लेकिन इसका प्रयोग हमारे देश में कई शताब्दियों से हो रहा है । चरक संहिता में भी लौंग का वर्णन मिलता है । आयुर्वेद में लौंग को पाचन पता हाजमे के लिए बहुत अच्छा बताया गया है । यह स्वाद में तीखा तथा अंतड़ियों को अच्छा बनाने वाला भी माना जाता है ।

लोंग का प्रयोग किस किस बीमारी में किया जाता है ?

लोंग का प्रयोग दांत दर्द , उल्टी , दमा , सर्दी , जुकाम सांस फूलना , भारीपन , दाद में , मानसिक रोगों के लिए भी लौंग को दवा बताया गया है ।

देव कुसुमा जो कि देव लोक का फूल भी माना जाता है । इसमें अणु का सवाद तथा मेहक के साथ-साथ हमारे लिए औषधीय गुण भी होते हैं ।

फूल पौधों के जननांग होते हैं । इनके आकर्षक रंग तथा मेहक होती है । स्वाद , आकार , रूप सब कीट पतंगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं ।

क्यों कोई फुल तिखा तथा तेज होने के लिए विकसित होगा । क्यों प्रकृति इस तरह कि सरचना का डिजाइन तथा चयन करती है जो कि उसे जिंदा रखें । लौंग का पौधा भी अपवाद नहीं है ।

लौंग की कच्ची कली तिखि और तेज होती है और तेल से भरी होती है । जो कि इन्हें बचाए रखने का काम करते हैं । जैसे ही कली खिलती है बात बदल जाती है ।

कीट मीठे रस वाले फूल की तरह खींचे चले आते हैं । लेकिन मानव तो उसकी कली की ओर आकर्षित हुआ उनकी मेक और स्वाद ने ना सिर्फ इंद्रियों को लुभाया बल्कि बुद्धिमता को भी लुभाया ।

प्राचीन मसाला है लौंग।

प्राचीन मसाला है लौंग । प्राचीन सौदागर इसे दूर दूर ले जाया करते थे । मनचाहे दाम पर बेच रहे थे । लौंग व्यापार का बहुत ही महंगा तथा मनचाहा मसाला था ।

लौंग पर आस्था देश की । सीमाओं में ही बंधी नहीं थी । यह खुशबूदार मसाला खाने के लिए तो था ही इसके साथ ही खाने वाले पदार्थों के संरक्षण में भी इसका इस्तेमाल किया जाता था ।

इसके गुणों की चाहत इतनी थी कि उन्होंने इतिहास की दिशा ही बदल दी । पुर्तगाली नाविक Ferdinand Magellan लौंग की खोज के लिए ही मलुका दीप निकले थे ।

इसी की तलाश में पृथ्वी का ऐतिहासिक चक्कर लगा डाला । विश्व इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ । 1522 में Magellan का जहाज अपनी ऐतिहासिक यात्रा से लौटा ।

Magellan Battle of Maction के युद्ध में मारे गए स्पेन की खुशी का ठिकाना ना रहा । जब लौंग और जायफल से लदा जहाज उनके हाथ लगा ।

लौंग का तेल जीवाणु नाशक और अपने फफूंद नाशक।

लौंग का पेड़ एक ही नहीं बहुत सारे रसायन बनाता है। और उन रसायनों को लौंग की कली में भर देता है । लोंग का कुल 15% हिस्सा उनके अणु का तेल ही होता है ।

लौंग के अणु मे Eugenol । लौंग का करीब 70 से 85% Eugenol ही होता है । अपने जीवाणु नाशक और अपने फफूंद नाशक गुणों के लिए जाना जाता है ।

Eugenol सूजन को कम करता है और दर्द निवारक भी माना जाता है । Eugenol तुलसी में भी पाया जाता है । जबकि लौंग में सबसे अधिक पाया जाता है ।

लौंग की जलन तथा तेजी ऐसी होती है कि मुंह को ठंडक मिलती है और शरीर को गर्माहट मिलती है । उसकी खुशबू तथा स्वाद का कारण उसके रसायन होते हैं ।

लौंग के तेल का करीब 15% Eugenyl Acetate होता है । लौंग की तेजी और खुशबू अनेक रसायनों का मिला-जुला रूप होता है ।

लौंग के तेल में B- Caryophyllene कि भी 5 से 12% मात्रा पाई जाती है । लौंग के तेल को इंसान ने बहुत जल्दी ही पहचान लिया था ।

लौंग का तेल Thieves oil क्यों कहलाता है ?

14 वीं शताब्दी में महामारी प्लेग ने गांव के गांव खाली करना शुरू कर दिया था । उस समय लोग मसालों के नकाब पहन करके अपनी सुरक्षा करते थे ।
और चोर लुटेरे लौंग के तेल में दूसरे गंध तेल का लेप लगाकर के शवों को लूटते थे । चोरों का यह मिशन आज भी Thieves oil कहलाता है । यह इतना प्रभावशाली था कि लौंग की धाक जम गई ।

खाने में लौंग , खाने के बाद लौंग, पान के पत्ते में लौंग । लौंग खाने की परंपरा बरकरार रही है । मुंह में ताजगी के साथ अच्छा हाजमा भी करता है लौंग । लौंग के बिना तो पान अधूरा माना जाता है ।

लौंग का करीबी रिश्ता दांत के उपचार में

दुनिया भर में लौंग का करीबी रिश्ता दांत के उपचार में तथा दांत के रोगों के लिए किया जाता है । साबुत लौंग हो या फिर पिसा लॉन्ग हो या फिर उसका तेल हो दांत के दर्द में रामबाण दवा का काम करता है ।

मुंह मौजूद दांत एनामेल से जुड़ा होता है और मुंह में बहुत ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं जो कि एनामेल को क्षति पहुंचाते हैं । संक्रमण के कारण दांत में बहुत जल्दी ही सड़न पैदा हो जाती है । मसूड़ों और जड़ों तक फैल सकती है और नतीजा दांतों में छेद , सूजन और सड़न और दर्द उत्पन्न हो जाता है ।

दांत दर्द के इलाज में लौंग अव्वल माना जाता है । लौंग मुंह के अंदर मौजूद सारे बैक्टीरिया को खत्म करने की ताकत रखता है । लॉन्ग बैक्टीरिया पर काबू करके संक्रमण को कम करता है ।

दांतों में छेद में किस मिश्रण का उपयोग किया जाता है ?

डेंटिस्ट भी जिंक ऑक्साइड तथा लौंग का तेल तथा यूजिनॉल का मिश्रण बनाकर के दांतों में छेद को भरते हैं । दंत चिकित्सकों के यहां से आने वाली खुशबू भी लौंग के तेल की होती है ।

लौंग दांत के दर्द में राहत देता है । लेकिन दर्द तो सिर्फ एक लक्षण होता है । लोंग तेल का गलत इस्तेमाल उत्तक को जला सकता है । दांत को मार तक सकता है । इलाज को उलजा सकता है ।

दांत में सड़न की आयुर्वेदिक दवाई भी इसी से बनाई जाती है । मसालों के तेल का एक नपा तुला मिश्रण होता है । आयुर्वेद चिकित्सा में लौंग के तेल के घरेलू खतरे पर चेतावनी देते हैं ।

लौंग के तेल को सीधा प्रयोग नहीं करना चाहिए । इसे या तो नारियल के तेल में या फिर तिल के तेल में मिलाकर के प्रयोग करना चाहिए ।

लौंग के तेल में एक और रोचक मॉलिक्यूल मिला है वैज्ञानिकों को । जिसका नाम है 2 – heptanone . यह मॉलिक्यूल मधुमक्खी के डंक में भी पाया जाता है । जब मधुमक्खी काटतु है तब इसकी छोटी सी मात्रा शिकार के अंदर डंक के माध्यम से छोड़ देती है ।

लौंग तथा मधुमक्खी कितने अलग होते हैं । लेकिन दोनों एक ही मॉलिक्यूल बनाते हैं । लौंग के तेल स्लाइड बनाने में भी काम आते हैं । इससे कोशिकाओं को तथा उतक की स्पष्ट आकृतियां दिखाई देती है ।

मसाले ज्ञान का परिणाम है तथा वर्षों की खोज का परिणाम है । एक ऐसा ज्ञान जिसे संजोने के लिए कितनी आजमाइश हुई होगी ।

लौंग ने इंसान को सौंदर्य , मेहेक स्वास्थ्य तथा स्वाद भी दिया है । हमारी रसोई तथा जीवन में इसका स्थान दूसरा कोई और मसाला नहीं ले सकता है ।

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