सुंदरबन-में-मैंग्रोव-को-हो-रहा-है-लगातार-नुकसान-मैंग्रोव-वन-क्या-होते-हैं

सुंदरबन में मैंग्रोव को हो रहा है लगातार नुकसान। मैंग्रोव वन क्या होते हैं?

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2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी ने बेरहमी से तबाही मचाई । 9.1 की तीव्रता वाले भूकंप के कारण जो ऊर्जा पृथ्वी से निकली उसकी ऊर्जा कई हजार परमाणु बम के जितनी थी ।

भारत के पूर्वी तट पर जबरदस्त तबाही नजर आई । और इस हादसे में 10000 से ज्यादा लोगों की जान चली गई । लेकिन तमिलनाडु का एक हिस्सा हैरत अंगेज ढंग से बच गया ।

खुद प्रकृति ने ही इसे प्रकृति की गोद से बचाया । यह थे मैंग्रोव वन । यह एक कमाल की जगह है । जिसमें कई बेशकीमती रात छिपे हुए हैं । जो कि हजारों लोगों की जिंदगी के साथ साथ इस महान देश को भी बचा सकते हैं ।

तमिलनाडु की तट रेखा के साथ साथ समुद्री और जमीनी इलाके के बीच मौजूद है बिजावर के मैंग्रोव वन । जो सदियों से मानव की रक्षा खामोशी से करते हुए आए हैं ।

मैंग्रोव वन अस्तित्व में कब आए थे ?

मैंग्रोव वन करीब 11 करोड़ 40 लाख साल पहले अस्तित्व में आए थे । भारत मैं भी कई मैंग्रोव वन मौजूद है ।

जो कि अंडमान निकोबार दीप समूह , गोदावरी कृष्णा डेल्टा , कावेरी डेल्टा , गोवा , रत्नागिरी , सुंदरवन तथा कच्छ की खाड़ी में देखने को मिलते हैं ।

मैंग्रोव वन दल दल वाले इलाकों में उगते हैं । यहां पर मिट्टी में ऑक्सीजन कम होती है तो जड़े ऑक्सीजन पाने के लिए ऊपर की तरफ बढ़ती है । यह नेगेटिविटी जियोट्रॉपिक होती है ।

यह जड़े वायुमंडल से ऑक्सीजन को सोखती है । यहां पर मिट्टी भी कीचड़ वाली होती है और अस्थर भी होती है । इसीलिए मैंग्रोव वन के पेड़ खुद को ढालने के लिए जड़ों को ऊपर की तरफ बढ़ाते हैं ।

यह जड़े मैंग्रोव वन के खारे पानी में भी पनपने की जगह देती है । इसके कारण लोगों और समुद्र के बीच एक मजबूत अवरोध बन जाता है । मैंग्रोव वन के पेड़ों की जड़ें जमीन के नीचे भी होती है ।

कुछ पेड़ों की जड़ें जमीन से बाहर निकली हुई होती है । जिससे कि यह मिट्टी को बांधे हुए रखते हैं ।जिससे कि मिट्टी में कंक्रीट जैसी संरचनाएं बन जाती है । जिससे कि मिट्टी इनकी जड़ों के साथ मजबूती से बंधी हुई रहती है ।

यदि मैंग्रोव वन के इन वनों को काट दिया जाए तो समुद्र की लहरों के कारण वह तटिये इलाका भी कट जाएगा ।

दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन

यदि भारत और बांग्लादेश के मैंग्रोव वन को मिला दिया जाए तो यह दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन बन जाएगा । भारत की तट रेखा बहुत लंबी है और यहां पर पर्यावरण के लिहाज से काफी विविधता भी है ।

लेकिन भारतीय तट रेखा पर हर जगह मैंग्रोव वन केवल मौजूद नहीं है । यह सिर्फ डेल्टा के मुहाने पर ही मिलते हैं । जैसे कि गोदावरी कृष्णा के डेल्टा पर मौजूद है । कावेरी डेल्टा , गोवा डेल्टा , रत्नागिरी तथा कच्छ की खाड़ी पर ही मैंग्रोव वन मौजूद हैं ।

डेल्टा नदी के अंतिम हिस्से पर बनते हैं । जहां पर नदी की मुलाकात समुद्र से होती है । वह जगह डेल्टा कहलाती है ।

इसका मतलब यह है कि जब नदी का बहाव तेज होता है तब मीठा पानी सीधा समुद्र में चला जाता है । जहां पानी अपने अंतिम छोर पर पहुंच जाता है तो तटिये क्षेत्र के पास ढाल घट जाता है ।

कोई एक नदी अनेक नदियों में बैंट जाती है । इसी तरह कावेरी डेल्टा कई अन्य नदियां बनी है ।

डेल्टा के मीठे पानी में गाद तथा कीचड़ आते है । मैंग्रोव वन के पेड़ों की जड़ें समुद्र के बीच बदलती जगह को भी बांध लेती है ।

आंध्र प्रदेश के तटीय इलाके की बात करें तो यहां पर तटीय इलाका तो है लेकिन मैंग्रोव वन के वन नहीं है ।

मैंग्रोव वन के विकास के लिए इलाका

सूर्य और चंद्रमा ने ज्वार भाटा के माध्यम से समुद्र के तट को शक्ल दी है । भु विज्ञान के नजरिए से किसी मैंग्रोव वन के विकास के लिए ऐसा इलाका होना चाहिए जहां पर खारा तथा मीठा पानी एक साथ मिलता हो ।

इस तरह के गड्ढे ज्वार भाटा के कारण आने वाले पानी से मिट्टी के कटाव के कारण लगातार बनते रहते हैं । किनारे तक आने वाले बहाव जिगजैग आकार का होता है । तमिलनाडु की तट रेखा ऐसी उबड़ खाबड़ तट रेखा है ।

कुदरत ने मैंग्रोव वनो को अपनी मुश्किल हालात में भी ढालने के लिए इतनी ताकत दी है कि अगली पीढ़ी के पनपने के शुरू से ही बेहतरीन मौके होते हैं । मैंग्रोव वन बहुत ही मुश्किल अवस्थाओं में भी पनप जाते हैं ।

इन पेड़ों के बीच इन के फूलों के साथ ही अंकुरित होते हैं । यदि वे नीचे गिर जाते हैं तो ज्वार भाटा के पानी के कारण बह जाते हैं । जब यह अंकुरित बिज भी जमीन को छूने लगते हैं तब यह उगने लगते हैं ।

मैंग्रोव वन डायनासोर के समकालीन

पानी के जरिए दूर-दूर तक फैलने की अपनी इसी खूबी के कारण मैंग्रोव वन पूरी दुनिया में और भारत में बहुत ज्यादा ही विविधता हासिल कर पाए हैं । मैंग्रोव वन डायनासोर के समकालीन ही है और यह क्रीटेशस  पीरियड के दौरान विकसित हुए थे ।

उस समय भूभाग दो रूपों में मौजूद था । पहला लोरएशिया कप का उत्तरी सुपरकॉन्टिनेंट हिस्सा और दक्षिण का गोंडवाना लैंड हिस्सा । इन दोनों को तेथिस सागर ने अलग किया था ।

मैंग्रोव वनो के विकास का इतिहास 100000000 साल का है । वैज्ञानिकों का मानना है कि शायद यही वह इलाका है जहां पर कैसियस यूग दौरान मैंग्रोव वन वन सबसे पहले पनपे थे ।

मैंग्रोव वन समुद्र की लहरों के साथ तेथिस सागर से बाहर की तरफ फैले । पश्चिम में भारत और पूर्वी अफ्रीका और पूर्व में अमेरिका की ओर फैले ।

Upper Creataceous period or Lower Miocene Epoch के दौरान छह करोड़ 60 लाख से 2 करोड़ 30 लाख साल के बीच हुआ । उस समय कैरेबियन बहुत विशाल था ।

एशिया माइनर की टक्कर से बना मेडिटेरियन का घेरा

उसने उत्तर तथा दक्षिण अमेरिका को अलग-अलग करके पानी में डूबते उत्तर आदि मैंग्रोव वन को एक रास्ता उपलब्ध कराया । और फिर करीब 18000000 साल पहले अफ्रीका तथा एशिया माइनर की टक्कर से मेडिटेरियन का घेरा बन जाने के कारण पश्चिमी तट के हिस्से अलग-थलग पड़ गया ।

जिसके फलस्वरूप दो भिन्न प्रजातियों का जन्म हुआ । बाद में यह अफ्रीका के पश्चिमी समुद्री किनारे से आगे बढ़ते हुए दक्षिण में न्यूजीलैंड तक जा पहुंचे ।

जिस indo-australian प्लेट पर भारत मौजूद है । जब वह टूटी और उत्तर की ओर एशियन प्लेट की तरफ बढ़ने लगी तो दक्षिण की शक्ल बदल गई और मैंग्रोव वन नई जगहों पर पनप गए ।

हालांकि उनका मूल पुराना ही था । भारत के मैंग्रोव वन पुराने दौर के मैंग्रोव वन से ताल्लुक रखते हैं । यानी कि यह प्राचीन मैंग्रोव वन है । जो दूसरे तरीके के मैंग्रोव वन है वह नई दुनिया के मैंग्रोव वन हैं।

भारतीय मैंग्रोव वन में जैव विविधता का स्तर सबसे ऊंचा

भारतीय मैंग्रोव वन पूरी दुनिया में इसलिए अनोखे हैं । यह मैंग्रोव वन पूरी दुनिया का 3% है । लेकिन भारतीय मैंग्रोव वन में जैव विविधता का स्तर ऊंचा है ।

भारत की मैंग्रोव वन से 4000 प्रजातियों और किस्मों का संकलन किया है । ज्वार और भाटा वाली स्थितियों के बीच सुंदरवन में भी जीव फलते फूलते हैं ।

मैंग्रोव वन की खूबी यह है कि किसी भी तरह के खारे पानी में रह सकते हैं ‌ चाहे प्रति हजार मे खारेपन का स्तर चार हो या फिर 35 हो । यहां पर ऐसी बहुत सारी प्रजातियां हैं जो खारे पानी में जीवित रह सकती है ।‌

जैसे कि मीठे पानी में मीठे पानी वाली मछलियां भी होती है और खारे पानी वाली मछलियां भी होती है । जवार भाटे वाले इस डेल्टा क्षेत्र में समुद्र से जमीन की ओर खालीपन के कई स्तर नजर आते हैं ।

खारापन बहुत ज्यादा भी हो सकता है और कम भी हो सकता है । इसी कारण ग्रुप में अत्यधिक खारे पानी को झेलने वाली किस्में भी मौजूद है ।

सुंदरवन के मैंग्रोव वन

सबसे सख्त दौर के दौरान सबसे सख्त किस्मों का जन्म होता है । यही बात सुंदरवन के मैंग्रोव वन को इतनी विविधता देती है । पेड़ पौधों और जीव में इतनी विविधता पर्यावरण की विविधता के कारण होती है ।

यह विविधता मौसम , महीनों , दिन के हिसाब से बदलती है । यां तक की प्रतिदिन के हिसाब से बदलती है । ज्वार की ऊंचाई 5 मीटर तक भी हो सकती है । ज्वार आने तक पानी मैंग्रोव वन इलाके में भर जाता है ।

तब खारा पानी इस वन को सिंचता है । और जब ज्वार घटता है तब बारिश का और दूसरा मीठा पानी यहां आने लगता है । यहां परिस्थितियां लगातार बदलती रहती है । जिनके कारण इतनी विविधता नजर आती है ।

बेहद खारे पानी को झेलने की मेन ग्रुप की काबिलियत का अध्ययन आनुवांशिक तौर पर किया जाता है । ताकि इलाकों में खेती को बढ़ाया जा सके ।

आज यह मैंग्रोव वन पर बहुत ही महत्वपूर्ण काम को अंजाम दे रहे हैं । जिससे कि हम आने वाले समय में होने वाले बदलाव के स्तर का अध्ययन कर पाएंगे ।

मैंग्रोव वन के वनों में पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की विविधता

मैंग्रोव वन के वनों में पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं की जबरदस्त विविधता पाई जाती है । मैंग्रोव वन वालों की मिट्टी ऑर्गेनिक मेटल के हिसाब से काफी समृद्ध होती है और इस मिट्टी को उपजाऊपन यहां पर गिरने वाले पत्तों से मिलती है ।

जो कि माइक्रो ऑर्गेनिजम की वजह से सड़ती रहती है । सड़ते हुए ऑर्गेनिक मैटर को टेट्राइटस कहा जाता है । यह इस क्षेत्र की मछलियों की एक महत्वपूर्ण खुराक होती है ।

इसे खाने के लिए मछलियां गहरे पानी से इधर आती रहती है । जब मछलियां व्यस्क हो जाती है तब वह गहरे सागर में चली जाती है । मछलियों का जीवन चक्कर मैंग्रोव वन की मौजूदगी में ही पूरा होता है ।

अपने जीवन चक्र को जारी रखते हुए यह मछलियां बहुत से स्थानीय मछुआरों को रोजी-रोटी प्रदान करती है । मैंग्रोव वन सिर्फ लोगों की रोजी-रोटी ही नहीं है । बल्कि यह अन्य लोगों की रोजी रोटी भी है ।

जीवाश्म ईंधन जलाने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है । जिससे कि ग्लोबिंग वार्मिंग बढ़ती है और जलवायु में बदलाव आता है ।

मैंग्रोव वन फोटो सिंथेटिक प्रक्रिया के दौरान इस कार्बन डाइऑक्साइड को अपनी पत्तियों तथा जड़ों के द्वारा सोख लेते हैं ।

कार्बन की बड़ी मात्रा स्टोर करते हैं मैंग्रोव वन।

यह पेड़ कार्बन की बड़ी मात्रा स्टोर करते हैं । यह कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बन में बदल देते हैं और इसे अपनी तलछट में जमा करके रखते हैं । इसे कहते हैं कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन ।

मैंग्रोव वन दुनिया की सबसे कुशल पर्यावरणीय प्रणालियों में से एक है ।‌ एक अनुमान के मुताबिक भारत में मैंग्रोव वन के 1 करोड़ 80 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड को हजम कर जाते हैं ।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका मूल्य 4 अरब डॉलर के बराबर होता है । लेकिन बदकिस्मती यह है कि जो मैंग्रोव वन ग्लोबल वॉर्मिंग को घटाने में मदद कर सकते हैं । वह खुद ही ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार बन रहे हैं ।

बढ़ते तापमान की वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और पिघलते ग्लेशियरों के कारण और समुद्र जमीन को निगलता जा रहा है।

पिछले 10 सालों में डेल्टा का 280 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र हम गवां चुके हैं । क्योंकि इसकी जगह समुद्र ने ले ली है जो कि तलछट के जमा नहीं होने के कारण हुआ है ।

यह मैंग्रोव वन केवल आगे बढ़ती समुद्री क्षेत्र को जमीनी क्षेत्र से बचाने वाले इकलौते सैनिक है । समुद्र के इलाके में बढ़ोतरी के कारण क्षेत्र पहले ही घट चुका है ।

लोगों की रक्षा के लिए भारत की तट रेखा को स्थिर बनाना जरूरी है । इसके लिए मैंग्रोव वन में पेड़ों की संख्या को बढ़ाना जरूरी है ।

वैज्ञानिक मैंग्रोव वनों में और अधिक पेड़ लगाने की कोशिश कर रहे हैं । जिससे कि समुद्र के बढ़ते कारण और इंसान की हरकतों के कारण यह हमला हो रहा है

मैंग्रोव वनों को बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है मीठे पानी की कमी । यदि मैंग्रोव वन के वनों में मीठे पानी पानी का पर्याप्त बहाव रहा तो मैंग्रोव वनो की सेहत अच्छी रहेगी और उनके क्षेत्रफल को भी बढ़ाया जा सकता है ।

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